Why Did God Create This Universe? आइए जानते हैं -
दोस्तों अनेकों वर्षों पहले, एक गुरुकुल में आचार्य चैतन्य अपने शिष्यों को पढ़ा रहे थे। भोजन के बाद, उनका एक शिष्य देवदत्त अपनी पत्तल में बचा हुआ अन्न लेकर चिड़ियों को खिलाने चला गया। जब वह काफी देर तक कक्षा में नहीं लौटा, तो आचार्य उसे ढूंढते हुए पहुंचे। देवदत्त को पक्षियों को दाना खिलाते देख आचार्य ने पूछा— 'देवदत्त, क्या आज तुम्हें व्याकरण का अध्ययन नहीं करना?'"देवदत्त ने मुड़कर एक ऐसा प्रश्न किया जिसने गहरी दार्शनिक चर्चा छेड़ दी। उसने पूछा— 'आचार्य, यदि ईश्वर को यह सृष्टि बनानी ही थी, तो वह इन जीवों का ध्यान क्यों नहीं रखता? इन्हें भोजन के लिए भटकना क्यों पड़ता है? ईश्वर अपनी सारी शक्तियां केवल दिखाता क्यों है, इनकी सीधी सहायता क्यों नहीं करता?' आचार्य मुस्कुराए। उन्हें समझ आ गया कि जिस सही समय की उन्हें प्रतीक्षा थी, वह आ गया है।"
आचार्य ने कहा— 'बेटा, बहुत समय पहले एक राजकुमार थे, सुमेध। एक दिन वे अपने मित्रों के साथ विशाल महल में लुका-छिपी खेल रहे थे। मित्र छुप गए और राजकुमार उन्हें ढूंढते-ढूंढते थक गए। तभी उनका मंत्री सुमंत आया और बोला, 'राजकुमार, आप परेशान क्यों हैं? आप एक आदेश दीजिए, सारे मित्र आपके सामने हाज़िर हो जाएंगे।' राजकुमार ने मुस्कुरा कर कहा— 'मंत्री जी, यदि मैंने आदेश दे दिया और वे सब एक जगह इकट्ठे हो गए, तो यह खेल तो पूरा का पूरा समाप्त हो जाएगा!'"
Why Did God Create This Universe? जानिए कारण...
आचार्य चैतन्य ने देवदत्त से कहा— बस देवदत्त 'यही ईश्वर का भी सच है।' दोस्तों जो बात राजकुमार सुमेध ने कही, वही बात महर्षि वेदव्यास जी ने ब्रह्म सूत्र (2.1.33) में कही है: "लोकवत् तु लीलाकैवल्यम्"। अर्थात् सृष्टि की रचना ईश्वर का कोई व्यापार नहीं है, बल्कि यह उनकी 'लीला' है।
अगर ईश्वर चाहे तो एक सेकंड में सबको सबकुछ दे दे, लेकिन फिर यह अनुभव, यह कर्म-सिद्धांत और आत्मा का विकास कैसे होगा? छान्दोग्य उपनिषद कहता है "तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति"—उसने एक से अनेक होने का संकल्प लिया ताकि वह इस पूरे खेल को अनुभव कर सके।"
अंत में बस इतना ही... आप और हम इस ब्रह्मांड में कोई इत्तेफाक नहीं हैं। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना... भगवान यह खेल खेल रहे हैं, अपनी लीला कर रहे हैं, सिर्फ इसीलिए आज हम और आप यहाँ हैं। ज़रा सोचिए... यदि वे एक पल के लिए भी यह खेल खेलना बंद कर दें, अपनी लीला रोक दें... तो हमारा क्या होगा?"