Which Is Best : VIVAH Or NIKAH ?
दोस्तों जहाँ हिंदू धर्म में अग्नि को साक्षी मानकर सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाई जाती हैं, जहां हिंदू धर्म में १६ संस्कारों में से एक अत्यंत पवित्र संस्कार विवाह को माना जाता है वह पद्धति तो कुछ तथाकथित लोगों के अनुसार ग़लत है परन्तु जहां एक व्यक्ति गुस्से में आकर, या केवल फोन पर, यहाँ तक कि व्हाट्सएप मैसेज पर तीन बार "तलाक, तलाक, तलाक" लिख दे... और बस! एक झटके में उस स्त्री का पूरा जीवन, उसका परिवार, उसका भविष्य सब कुछ खत्म! हो जाता है, ऐसा विवाह इनके लिए सबसे अच्छा माना जाता है । मैं पूछना चाहता हूं कि क्या एक स्त्री का वजूद इतना सस्ता है कि तीन शब्दों में उसकी पूरी जिंदगी का फैसला हो जाए? और ये हमें सिखाएंगे कि विवाह क्या होता है?आइए आज मैं सब कुछ विस्तार से बताउंगा ...
दोस्तों हिन्दू धर्म में "तलाक" जैसा शब्द ही नहीं है, क्योंकि हिन्दू धर्म में जो जुड़ता ही जन्म-जन्मांतर के लिए है, उसके टूटने की परिकल्पना ही वैदिक चिंतन में नहीं है।अब जिसे ये लोग सबसे बढिया पद्धति बताते हैं उनका एक सबसे भयानक और अमानवीय सच बताता हूं जिसका नाम है हलाला!, आइए बताता हूं --
मान लीजिए, पति ने गुस्से में तीन तलाक दे दिया और बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।
अब वह अपनी उसी पत्नी को वापस लाना चाहता है। लेकिन नहीं! वह सीधे अपनी पत्नी को वापस नहीं अपना सकता। उस बेचारी स्त्री को सजा के तौर पर पहले किसी दूसरे पुरुष से निकाह करना पड़ेगा, उसके साथ शारीरिक संबंध (हमबिस्तरी) बनाने पड़ेंगे, और जब वह दूसरा आदमी उसे तलाक देगा, तब जाकर वह अपने पहले पति के पास लौट सकेगी। दोस्तों ऐसा एक नहीं अपितु अनेकों महिलाओ के साथ हुआ है, अब बताइए ऐसी घृणित मानसिकता को तो सोचते ही रोंगटे खडे हो जाते हैं, ना जाने ये बहनें कैसे झेलती होंगी पर इस व्यक्ति को ये पद्धति सबसे अच्छी लगती है ।
दोस्तों अगर यह व्यवस्था इतनी ही महान और स्त्री-हितैषी है, तो क्या ये लोग ईरान की वह ऐतिहासिक घटना भूल गए? जहां ईरान में लाखों मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर अपने हिजाब उतार फेंके और उन्हें आग के हवाले कर दिया। 'महसा अमिनी' की शहादत के बाद उन महिलाओं ने अपनी जान की परवाह किए बिना उस थोपे गए पर्दे और कट्टरपंथी नियमों से बगावत कर दी। कई महिलाओं ने खुलेआम इस व्यवस्था को नकार दिया। क्यों? क्योंकि कोई भी स्वतंत्र और आत्मसम्मान वाली स्त्री घुटन में नहीं जीना चाहती। जो महिलाएं खुद इस व्यवस्था को झेल रही हैं, वो इसे जला रही हैं, और यहाँ बैठे कुछ लोग इसे 'सबसे बढ़िया' बताने का सर्टिफिकेट बाँट रहे हैं! अरे जाकर देखो उन महिलाओं को क्या महसूस होता होगा जिन्हें २४ घण्टे एक पर्दे के अंदर बंद करके रखा जाता है ?
परन्तु दोस्तों सनातन धर्म ने स्त्री को 'शक्ति' माना है, 'प्रॉपर्टी' या 'कॉन्ट्रैक्ट' नहीं। हमारे यहाँ विवाह दो आत्माओं का वह बंधन है जो किसी के तीन बार बोलने से नहीं टूटता। आइए अब हिन्दू धर्म के प्रमाण दिखाता हूं -
Hindu Vivah
मित्रों हिंदू धर्म में विवाह १६ संस्कारों में से एक अत्यंत पवित्र संस्कार है, जो केवल शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का जन्म-जन्मांतर का बंधन है। हिंदू धर्म में स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। विवाह के बाद ही व्यक्ति धार्मिक और सामाजिक कर्तव्यों (यज्ञ, अनुष्ठान) को पूर्ण रूप से करने का अधिकारी बनता है। (शतपथ ब्राह्मण 5.2.1.10) में आता है - "अर्धो ह वा एष आत्मनो यज्जाया तस्माद्यावज्जायां न विन्दते नैव तावत्प्रजायतेऽसर्चो हि तावद्भवत्यथ यदैव जायां विन्दतेऽथ प्रजायते तर्हि हि सर्वो भवति।" पत्नी मनुष्य की आत्मा का आधा भाग है। इसलिए जब तक व्यक्ति पत्नी प्राप्त नहीं करता, तब तक वह अधूरा ही रहता है। जब वह पत्नी प्राप्त कर लेता है, तभी वह पूर्ण होता है।
दोस्तों वैदिक विवाह में पति, पत्नी का हाथ पकड़कर जीवन भर उसके संरक्षण और सम्मान देने का वचन देता है। (ऋग्वेद 10.85.36 – में आता है - "गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः। भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः॥" अर्थ: हे वधु! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिए तुम्हारा हाथ पकड़ता हूँ, ताकि तुम मुझ पति के साथ वृद्धावस्था तक जीवन व्यतीत करो। भग, अर्यमा, सविता और पुरन्धि आदि देवताओं ने तुम्हें गृहस्थ धर्म के पालन के लिए मुझे सौंपा है।
इसके आगे हिंदू विवाह में 'सप्तपदी' (अग्नि के सात फेरे) सबसे महत्वपूर्ण चरण है। बिना सात फेरों के हिंदू विवाह पूर्ण नहीं माना जाता। यह प्रथा दर्शाती है कि पति-पत्नी का रिश्ता किसी अधीनता का नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ मित्रता का है। (आश्वलायन गृह्यसूत्र 1.7.19): में आता है - "सखा सप्तपदी भव सखायौ सप्तपदा बभूव। सख्यं ते गमेयम्, सख्यात् ते मा योषम्, सख्यान् मे मा योष्ठाः॥" अर्थ: सात कदम साथ चलने से तुम मेरी मित्र बन गई हो। हम दोनों मित्र हो गए हैं। मैं तुम्हारी मित्रता को प्राप्त करूँ; मैं तुम्हारी मित्रता से कभी अलग न होऊँ और तुम मेरी मित्रता से कभी अलग न होओ।
हिंदू धर्म में विवाह का मुख्य उद्देश्य केवल शारीरिक सुख (रति) नहीं है, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की संयुक्त यात्रा है। महाभारत और मनुस्मृति में स्पष्ट है कि पत्नी धर्म, अर्थ और काम—तीनों की प्राप्ति का मूल है। मनुस्मृति (9.46) में स्पष्ट कहा गया है कि पत्नी को न तो बेचकर और न ही त्याग कर पति से अलग किया जा सकता है: "न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते।"मित्रों जो व्यवस्था दो व्यक्तियों को केवल 'समझौते' से परे जाकर एक-दूसरे का 'आधा अंग' (अर्धनारीश्वर स्वरूप) मानती हो, जो अग्नि जैसे पवित्र तत्त्व को साक्षी मानकर वृद्धावस्था तक साथ निभाने का संकल्प दिलाती हो, और जहाँ स्त्री को गृहस्वामिनी (साम्राज्ञी श्वशुरे भव - ऋग्वेद) का दर्जा दिया गया हो, वह विवाह पद्धति संसार की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक पद्धति है।
दोस्तों सनातन धर्म विश्व का इकलौता ऐसा दर्शन है, जो स्पष्ट कहता है कि जहाँ स्त्री का सम्मान नहीं, वहाँ के सारे धार्मिक कर्मकांड, सारी पूजा-पाठ राख के समान हैं। मनुस्मृति, जिसे बिना पढ़े गालियां देने का आजकल ट्रेंड है, उसका अध्याय 3, श्लोक 56 चीख-चीख कर कहता है:"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥"(अर्थात: जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहीं देवता निवास करते हैं। और जहाँ इनका सम्मान नहीं होता, वहाँ किये गए सभी कर्म और अनुष्ठान निष्फल हो जाते हैं।
अब बताइए, क्या दुनिया के किसी और तथाकथित 'प्रगतिशील' दर्शन में यह लिखा है कि तुम्हारी इबादत या प्रार्थना तब तक कबूल नहीं होगी जब तक तुम घर की स्त्री का सम्मान नहीं करते? परन्तु दोस्तों आजकल यह ट्रेंड बन गया है कि हर कोई हिन्दू धर्म पर आक्षेप उठाता है, पर अब आपको समझ आगया होगा कि कौन सी पद्धति उत्तम है । आज हम सभी को जागना होगा और हिन्दू धर्म पर आक्षेप करने वालो को जवाब देना होगा । अपनी संस्कृति पर गर्व करें ।
जय श्री राम ।