5 MYTH Or LOGIC ?
दोस्तों इंसानी दिमाग का यह स्वभाव है कि वह 'डर' को जल्दी मानता है। अगर पुराने समय में कोई बुजुर्ग कहता कि "रात में या मंगलवार को नाखून मत काटो, अंधेरे में उंगली कट जाएगी," तो शायद युवा पीढ़ी इसे अनसुना कर देती। लेकिन जब यह कहा गया कि "मंगलवार को नाखून काटने से पाप लगेगा या घर में गरीबी आएगी," तो डर के मारे लोगों ने इसे बिना सवाल किए मान लिया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह डर बढ़ता गया और असली कारण पीछे छूट गया।आइए जानते है इसका असली कारण –पुराने समय में समाज की व्यवस्था अलग थी। नाई (barber) पूरा सप्ताह काम करते थे और उन्हें भी आराम के लिए एक दिन चाहिए होता था। जैसे गुरुकुलों में रविवार को अवकाश नहीं होता अपितु पूर्णिमा, अमावस्या अथवा अष्टमी में होता है, उसी प्रकार ज्यादातर गांवों और कस्बों में नाइयों की छुट्टी तय कर दी गई थी। धीरे-धीरे यह एक नियम बन गया कि "मंगलवार को बाल नहीं कटवाते।"दूसरा कारण गुरुवार या अन्य विशेष दिनों को अक्सर घर की साफ-सफाई या भगवान की पूजा के लिए रखा जाता था। बाल काटने के बाद नहाना जरूरी माना जाता था, और पुराने समय में पानी कुएं या नदी से भरकर लाना पड़ता था। बेवजह पानी और समय की बर्बादी रोकने के लिए भी कुछ दिन बाल धोने या काटने की मनाही कर दी गई।आधुनिक समय में विज्ञान की नजर में बाल और नाखून दोनों ही 'केराटिन' (Keratin) नाम के मृत प्रोटीन (Dead Cells) से बने होते हैं। इनमें कोई जान नहीं होती, इसीलिए इन्हें काटने पर हमें दर्द नहीं होता। सप्ताह के सातों दिन ब्रह्मांड और पृथ्वी की स्थिति लगभग एक जैसी ही काम करती है। दिन या वार का इन मृत कोशिकाओं को काटने से कोई भी वैज्ञानिक या शारीरिक संबंध नहीं है। आज हमारे पास नेल क्लिपर, ट्रिमर, बेहतरीन रोशनी, और फर्स्ट-एड की पूरी सुविधा है। इसलिए अपनी सुविधा और हाइजीन (साफ-सफाई) के अनुसार किसी भी दिन इन्हें काटना पूरी तरह सुरक्षित है।दोस्तों ऐसा वेद शास्त्रों में कहीं भी कोई कारण नहीं है जहां यह लिखा हो कि इस दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए |
दोस्तों मनोविज्ञान में एक स्थिति होती है जिसे 'कन्फर्मेशन बायस' कहते हैं। इसका मतलब है कि हमारा दिमाग सिर्फ उसी चीज को याद रखता है, जो हमारे डर या विश्वास को सच साबित करती है। अगर किसी दिन बिल्ली रास्ता काटे और आपके साथ कुछ भी बुरा न हो तो आप उसे भूल जाते हैं। लेकिन अगर बिल्ली रास्ता काटे और इत्तेफाक से उस दिन आपकी गाड़ी पंचर हो जाए या बॉस से डांट पड़ जाए, तो आपका दिमाग तुरंत कहेगा- "देखा! बिल्ली ने रास्ता काटा था, इसीलिए ऐसा हुआ।दोस्तों बिल्ली का रास्ता काटना भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी माना जाता है, आइए जानते हैं इसका कारण । पहले लोग बैलगाड़ी या घोड़ों से यात्रा करते थे। जंगल के रास्ते में जब कोई जंगली बिल्ली (शेर, चीता या जंगली बिल्ली) रास्ता काटती थी, तो जानवर डर कर रुक जाते थे। यात्रियों को थोड़ी देर रुकना पड़ता था ताकि उनके वाहन वाले जानवर शांत हो जाएं।दूसरा कारण जब कोई जंगली जानवर रास्ता काटता था, तो इसका सीधा मतलब था कि आस-पास कोई शिकारी है। ऐसे में समझदारी इसी में थी कि थोड़ी देर रुक जाया जाए, ताकि वह जानवर वहां से चला जाए और बैल या घोड़े भी शांत हो जाएं। यह कोई 'अपशकुन' नहीं था, बल्कि जान बचाने की एक बेहद जरूरी 'सावधानी' थी।दोस्तों आज समय के साथ जंगल खत्म हो गए, कच्चे रास्तों की जगह पक्की सड़कों ने ले ली, और बैलगाड़ी की जगह कार-बाइकों ने ले ली। जंगली बिल्लियों (Big Cats) की जगह हमारे आस-पास रहने वाली छोटी घरेलू बिल्लियों ने ले ली। लेकिन लोगों के दिमाग में "बिल्ली दिखे तो रुक जाओ" वाला नियम जस का तस बसा रहा।धीरे-धीरे इस नियम में धार्मिक और ज्योतिषीय डर भी मिला दिए गए। कुछ जगहों पर बिल्ली को 'राहु' (Rahu) ग्रह की सवारी मान लिया गया, जिसे दुर्घटना और बाधाओं का प्रतीक माना जाता है। पश्चिमी देशों से यह अंधविश्वास भी आ गया कि 'काली बिल्ली' चुड़ैलों का रूप होती है या दुर्भाग्य लाती है।परन्तु इसका निर्देश वेद शास्त्रों में कहीं भी नहीं मिलता है ।
दोस्तों आजकल के समय में सब कहते हैं कि रात में झाडू नहीं लगानी चाहिए क्योंकि लक्ष्मी चली जाती है, आइए जानते हैं ऐसा क्यों कहा गया ।
दोस्तों पुराने समय में घरों में ट्यूबलाइट या बल्ब नहीं होते थे। लोग मिट्टी के दीयों, लालटेन या मशाल की मद्धम पीली रोशनी पर निर्भर थे। दिन भर के काम के दौरान अगर कोई कीमती चीज (जैसे सोने की अंगूठी, चांदी का सिक्का, या कान का मोती) मिट्टी के फर्श पर गिर जाती थी, तो रात के अंधेरे में झाड़ू लगाते वक्त वह कूड़े के साथ घर से बाहर फेंके जाने का बहुत बड़ा खतरा था।
अथवा माताएं बहनें जो आभूषण पहनती थी वे रात में कहीं गिर ना जाए इसलिए यह कहा गया था कि रात में झाडू नहीं लगानी चाहिए । दूसरा कारण पहले घर कच्चे होते थे। मिट्टी या गोबर से लीपे गए फर्श पर झाड़ू लगाने से धूल बहुत ज्यादा उड़ती थी, जो दीये की हल्की रोशनी को और भी धुंधला कर देती थी। इन्हीं बातों के कारण रात में झाडू लगाने को मना किया जाता था ।
दोस्तों नींबू में सिट्रिक एसिड (Citric Acid) और हरी मिर्च में कैप्सैसिन (Capsaicin) नाम का तत्व होता है। जब इन्हें एक सूती धागे (Cotton thread) में पिरोया जाता है, तो धागा इनके रस को सोख लेता है। हवा चलने पर यह रस वाष्पीकृत (Evaporate) होकर आस-पास के वातावरण में एक खास गंध फैलाता है। पुराने समय में जब 'मच्छर मारने की कॉइल' या 'पेस्ट कंट्रोल' नहीं होते थे, तब यह गंध कीड़े-मकौड़ों, मच्छरों और मक्खियों को घर या दुकान से दूर रखने का सबसे असरदार तरीका थी।
दूसरा कारण पहले लोग मीलों का सफर पैदल या बैलगाड़ी से तय करते थे। नींबू पानी की कमी दूर करने और विटामिन-C देने के काम आता था। वहीं, अगर रास्ते में कोई जहरीला कीड़ा या सांप काट ले, तो मिर्च चबाकर यह चेक किया जाता था कि जहर नर्वस सिस्टम (Nervous System) तक पहुंचा है या नहीं (अगर मिर्च का तीखापन महसूस न हो, तो मतलब जहर फैल चुका है)। इसलिए लोग इसे अपने साथ रखते थे या वाहनों पर टांग लेते थे। परन्तु आजकल जो भ्रम फैलाया जाता है उसका भी हमारे वेद शास्त्रों में कहीं भी वर्णन नहीं मिलता है ।
दोस्तों यह अंधविश्वास हमारे समाज की मानसिकता और पुरानी जीवनशैली को समझने का एक बहुत ही बेहतरीन उदाहरण है। दोस्तों ज्यादातर पेड़ दिन में प्रकाश संश्लेषण के दौरान ऑक्सीजन छोड़ते हैं और रात में श्वसन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। बरगद, आम या नीम जैसे विशाल पेड़ों के नीचे रात में हवा का बहाव रुक जाता है और का भारी आवरण बन जाता है। इस गैस के कारण इंसान को घुटन, छाती पर भारीपन और घबराहट महसूस हो सकती है। इसे ही पुराने जमाने के लोग "भूत का छाती पर बैठना" समझ लेते थे।
विज्ञान का सबसे बड़ा रोचक तथ्य यह है कि पीपल (Ficus religiosa) उन गिने-चुने पेड़ों में से एक है, जो रात में भी ऑक्सीजन छोड़ता है! पीपल में एक खास तरह की प्रक्रिया होती है जिसे Crassulacean Acid Metabolism (CAM) कहते हैं। इसका मतलब वैज्ञानिक नजरिए से पीपल के नीचे रात में घुटन नहीं होनी चाहिए! तो फिर सबसे ज्यादा भूत पीपल पर ही क्यों माने गए? इसका कारण विज्ञान की जगह इसके भौतिक आकार और मनोविज्ञान में छिपा है।
दोस्तों पीपल के पत्तों की बनावट बहुत खास होती है। आगे से इनकी नोक एक लंबी पूंछ जैसी होती है । इस बनावट के कारण, जब रात के सन्नाटे में हल्की सी भी हवा चलती है, तो पत्ते आपस में टकराकर जोर-जोर से फड़फड़ाने लगते हैं। अंधेरे में यह आवाज ऐसी लगती है जैसे कोई फुसफुसा रहा हो, रो रहा हो ।
दूसरा कारण पीपल का पेड़ बहुत विशाल होता है और इसकी उम्र सैकड़ों साल होती है। इसके घने अंधेरे में उल्लू, चमगादड़ और सांप अपना बसेरा बना लेते हैं। रात के समय अचानक किसी चमगादड़ का उड़ना या उल्लू की आवाज आना किसी भी इंसान के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी था।
तीसरा कारण पुराने समय में पीपल के पेड़ अक्सर गांवों के बाहर, चौराहों पर, या श्मशान घाट के आस-पास लगाए जाते थे, क्योंकि इन्हें पवित्र माना जाता था और यह 24 घंटे ऑक्सीजन देते थे। श्मशान के पास होने के कारण लोगों के दिमाग में यह बात बैठ गई कि मरने वालों की आत्माएं इसी पेड़ पर जाकर बैठ जाती हैं।
दोस्तों पुराने समय में बिजली नहीं होती थी। रात के अंधेरे में अगर कोई व्यक्ति (खासकर बच्चे) गांव के बाहर किसी विशाल पेड़ के पास जाए, तो उसे सांप-बिच्छू के काटने या जंगली जानवर के हमले का डर था। सीधे शब्दों में "वहां मत जाओ, सांप काट लेगा" कहने से शायद लोग न मानते। लेकिन जब यह कह दिया गया कि "रात को पीपल पर ब्रह्मराक्षस या भूत जागते हैं," तो डर के मारे किसी ने उस पेड़ के पास जाने की हिम्मत ही नहीं की।
परन्तु वेद शास्त्रों में दोस्तों ऐसा कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है कि पीपल पर भूत प्रेत का निवास होता है ।