Manusmriti Me Maans - मनुस्मृति में मांस ?
आज हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि अपना हिन्दू समाज ही अपनी कुंठित मानसिकता के कारण और अज्ञानता के कारण अपने देवी देवताओं का उपहास करता रहता है और अपने ही ऋषि मुनियों के ग्रंथो को बिना पढ़े कुछ वैदेशिक मानसिकता से पीड़ित लोगों के बहकावे में आकर जलाता रहता है | उन्हीं ग्रंथों में से एक ग्रंथ है मनुस्मृति | यह ग्रंथ सदैव विवादों से घिरा रहा है | आज भी कुछ कुंठित मानसिकता वाले लोग मनुस्मृति को जलाते हैं, और 25 दिसंबर के दिन तो ये मनुस्मृति दहन दिवस भी मनाते हैं | यहां एक बात ध्यातव्य है कि इनमें से कुछ लोग तो ऐसे हैं जो हिन्दू होते हुए भी स्वयं को हिन्दू भी नहीं मानते हैं|
मित्रों इससे अधिक और क्या कहें कि विडंबना तो यह भी है कि स्वयं को विद्वान् मानने वाले कुछ मुस्लिम प्रवक्ता भी इस ग्रंथ के अनाप सनाप उदाहरण देकर इस ग्रंथ के प्रति हिन्दू समाज के मन में द्वेषभावना भर रहे होते हैं | और हम उनकी बात को मान भी लेते हैं | आश्चर्य तो तब भी होता है जब भारत के बहुत से प्रसिद्ध एवं विख्यात संत भी राजनीति के कारण इस विषय पर मौन हो जाते हैं | मनुस्मृति पर आज जो वातावरण बनाया जा रहा है, वह केवल ग्रंथ का मुद्दा नहीं है, बल्कि सनातन धर्म को क्रमशः अपमानित करने की एक सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा दिखता है। मनुस्मृति के जिन अंशों को लेकर आज लोग आपत्ति जताते हैं, उनमें से अनेक अंश स्वयं विद्वानों के अनुसार बाद में जोड़े गए प्रक्षिप्त अंश हैं, मूल मनुस्मृति नहीं। हजारों वर्ष पुराना ग्रंथ है, कई शताब्दियों में नकल और संशोधन होना स्वाभाविक है। लेकिन आज पूरा ग्रंथ दोषी ठहराकर उसे जलाना एक प्रतीकात्मक हमला है। हाल ही में मनुस्मृति को जलाने की कई घटनाएँ हुईं—कभी किसी राजनीतिक संगठन की ओर से, कभी विश्वविद्यालयों में, और कभी इसे मीडिया में उछालकर हिंदू परंपरा को दोषी दिखाने के प्रयास हुए।
लोग दूसरों के भ्रम में आकर मनुस्मृति पर आज यह भी आक्षेप लगाते हैं कि मनुस्मृति मांसभक्षण का समर्थन करती है । दोस्तों आज स्वयं मनुस्मृति अपने प्रमाणों के साथ स्वयं इस बात की पुष्टि करेगी । आइए जानते हैं -
Manusmriti Me Maans ? क्या कहते हैं प्रमाण ?
मनुस्मृति के पांचवे अध्याय के 51वें श्लोक में आता है -
अर्थात् किसी भी प्राणी को मारने की अनुमति या आज्ञा देने वाला, मांस को काटने वाला, पशु पक्षी आदि को मारने वाला, मारने के लिए पशुओं को मोल लेने वाला और मांस को खरीदने वाला तथा बेचने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला, और खाने वाला ये सब हत्यारे और पापी हैं | इसी श्लोक से यह सिद्ध हो जाता है कि मांस खाना तो बहुत दूर की बात है मांस को परोसने वाला और बेचने वाला भी मनुस्मृति ने पापी बताया है |
इसके बाद मनुस्मृति अपने पांचवे अध्याय के 4५वे श्लोक में कहती है -
योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छ्या ।
स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ॥ ४५ ॥
(यः) जो व्यक्ति (आत्मसुख इच्छया) अपने सुख की इच्छा से (अहिंसकानि भूतानि) कभी न मारने योग्य प्राणियों की (हिनस्ति) हत्या करता है (सः) वह (जीवन् च मृतः) जीते हुए और मरकर भी (क्वचित् सुखं न एधते) कहीं भी सुख-शान्ति को प्राप्त नहीं करता अर्थात् प्राणियों की हत्या करने वाले को इस जन्म और परजन्म में दुःख प्राप्त होता है ॥ ४५ ॥
इससे आगे पांचवे अध्याय का 4६वा श्लोक, ४७वां श्लोक, ४८ वां श्लोक, ४९ वां श्लोक, ५१ वां श्लोक, दूसरे अध्याय का 152 वा श्लोक,चौथ अध्याय का 246वा श्लोक, छठे अध्याय का 52वा श्लोक, छठे अध्याय का 60वा श्लोक, तीसरे अध्याय के 68, 69वे श्लोक सारे के सारे श्लोक मांस भक्षण का निषेध करते हैं, और मांस खाने वाले को पापी मानते हैं ।अरे ये तो छोड़िए मनु महाराज इसी पांचवे अध्याय के पांचवे श्लोक में कहते हैं -
लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डु कवकानि च।
अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवाणि च ॥ ५ ॥
लहसुन, सलगम, प्याज, कुकुरमुत्ता और अशुद्ध स्थान में होने वाले सभी पदार्थ (द्विजातीनाम् अभक्ष्याणि) अभक्ष्य हैं, अर्थात् ये नहीं खाने चाहिए |अरे जो मनुस्मृति प्याज और लहसुन को भी उसके तमोगुण होने के कारण मना करे वह मनुस्मृति मांस खाने का समर्थन कैसे कर सकती है ?
जिस मनुस्मृति का पांचवां अध्याय मेरे द्वारा पहले बोले गए सभी श्लोकों के द्वारा मांस खाने का पूरी तरह से खंडन कर रहा है, एक तरफ वहीं पांचवे अध्याय का 56वा श्लोक मांस खाने का समर्थन कैसे कर सकता है ?
आप स्वयं देख सकते हैं कि मनुस्मृति के पांचवे अध्याय के 45, 46, 47, 48, 49, 51वे श्लोकों में साफ तरीके से मांस खाने का विरोध किया है वहीं 56वे श्लोक में मांस खाने का समर्थन कैसे कर दिया ? यही प्रमाण है कि मनुस्मृति को दूषित करने के लिए इसके अंदर छेड़छाड़ की गई, इसके अंदर श्लोकों को मिलाया गया | नहीं तो आप खुद सोचो ना, कि आपस में इतना विरोध एक ग्रन्थ में कैसे हो सकता है कि एक तरफ उसी अध्याय में मांस खाने की बात हो और दूसरी तरफ उसी अध्याय में मांस खाने का पूरा विरोध हो । इसलिए मनुस्मृति के जिन अंशों को लेकर आज लोग आपत्ति जताते हैं, उनमें से अनेक अंश स्वयं विद्वानों के अनुसार बाद में जोड़े गए प्रक्षिप्त अंश हैं, मूल मनुस्मृति नहीं। हजारों वर्ष पुराना ग्रंथ है, कई शताब्दियों में नकल और संशोधन होना स्वाभाविक है।
लेकिन ऐसे विरोधियों ने हमेशा विरोध करने के लिए केवल उन श्लोकों का उदाहरण दिया जिन श्लोकों के माध्यम से उनका कारोबार चल रहा था, और उनके आका खुश हो रहे थे, जिनके द्वारा ऋषियों का उपहास उड़ाया जा रहा था | पर जिन श्लोकों को मैंने बताया उनमें से किसी भी एक श्लोक को उन्होंने नहीं बताया, इससे साफ पता लगता है कि वे केवल हमारे ग्रंथों को दूषित करने का षडयंत्र कर रहे है |आज मनुस्मृति पर सवाल उठाए जा रहे हैं, आज मा सरस्वती जी की मूर्तियों को विद्यालयों से हटाया जा रहा है, आज फिर से ऐसे लोगों के द्वारा हमारे रामजी पर फिर से दाग लगाए जा रहें हैं, इसलिए हमें जागना होगा |